
'सूचना का अधिकार' कानून लागू होने के ढाई साल बाद भी पंजाब में 'आरटीआई एक्ट' महज मजाक था। 'आरटीआई एक्ट' के तहत यहाँ न तो हिंदी में आवेदन स्वीकार किये जाते थे और न ही हिंदी में जानकारी प्रदान की जाती थी. ये स्थिति तब थी, जबकि 60 फ़ीसदी लोग यहाँ हिंदी भाषी है. पंजाब सरकार के आदेश पर राज्य के सभी सरकारी दफ्तरों में इस आशय के 'सूचना पट' लगा दिए गये थे कि 'आरटीआई एक्ट' के तहत सिर्फ 'पंजाबी और अंग्रेजी' में ही आवेदन स्वीकार किये जायेंगे और इन्हीं भाषाओं में सूचना दी जाएगी. 'आरटीआई एक्ट' के तहत हिंदी में सूचना न देने से पंजाब सरकार की मंशा हिंदी को दोयम दर्जे की भाषा समझने और 'आरटीआई एक्ट' की धार कुंद करने की मालूम पड़ती थी. वर्ष 2008 की बात है. दैनिक भास्कर लुधियाना में बतौर रिपोर्टर प्रशासनिक बीट कवर करता था. डिप्टी कमिश्नर के आफिस में एक सूचना के लिए हिंदी में आवेदन किया, जिसे लेने से मना कर दिया गया. हिंदी में आवेदन स्वीकार न करने से जिला प्रशासन द्वारा आफिसियल लैग्वेज एक्ट 1963 , भारतीय संविधान की धारा 350 और आरटीआई एक्ट की धारा 6 (1) का उल्लघन हुआ. इस बात को आधार बनाकर खबर लिखी. खबर छपी तो व्यापक जनप्रतिक्रिया आई. हमारे तत्कालीन समाचार संपादक कुमार अभिमन्यु जी और स्थानीय सम्पादक राजीव सिंह जी के निर्देश पर इस खबर को पंजाब की 60 फीसदी हिंदी भाषी जनता के लिए मुद्दा बना दिया. पहली खबर छपने के बाद लुधियाना के डीएम सुमेर सिंह गुर्जर से हिदी में भी जानकारी उपलब्ध करवाने के लिए बात की तो डीएम ने साफ मना कर दिया. फिर क्या था. डीएम ने जैसा जवाब दिया, वैसा ही लिख दिया. अगले दिन डीएम का जवाब छपने के बाद खूब हंगामा हुआ. जनता ने इसे अपना मुद्दा बना लिया. इस मसले पर करीब दर्जन भर खबरें छपीं. खबर को आधार बना कर एक एनजीओ ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर दी. कोर्ट में सुनवाई के दौरान डीएम ने हाथ जोड़ कर माफ़ी मांगी, जबकि पंजाब सरकार को तुरंत हिंदी लागू करने का आदेश दिया गया.
याद है ये स्टोरी. आपका पहला धमाका थी. स्टोरी से पहले आपने बताया था कि कुछ बडा करने जा रहे हैं. तब मैं हिसार में था. फिर तो कमाल ही हो गया. मैं लुधियाना आया और साल भर से ज्यादा वक्त आपके साथ गुजारा. इस तरह आपके और करीब आने का मौका मिला. आप बडा सोचते हैं और रिस्क लेना तो जैसे आपका शगल हो. मुझे ठीक से याद है वो दिन जब आपके पास जज को फंसाने के सारे सबूत थे. वो तो शुक्र था कि संपादक ने स्टोरी रोक ली वरना खबर छपती तो आपकी जेल पक्की थी. फिर भी आखिरी वक्त तक आप जिद करते रहे थे. गजब है आपका खबरों से लगाव. और अब तो पंजाब में भी आरटीआई का जवाब हिंदी में मिलने लगा है. बधाई हो शानदार खबर के लिए.
ReplyDeleteIt is a great feeling to see that meaningful journalism is still being done by some. Keep it up...you keep the hopes of general public alive. Even otherwise making language an excuse for not providing information seems illogical and merely an excuse.
ReplyDeletewell done sir good story its
ReplyDeleteVERY WELL DONE MR. PARDEEP KEEP IT UP
ReplyDeleteINDIA NEED PEOPLE LIKE U. ALSO HELP PEOPLE WHO ARE AFFECTED BY POLITICAL LEADERS & BUREOCRACY
प्रणाम भाई,वास्तव में पत्रकारिता आपका जूनून है,आपकी पूजा है..मुझे उम्मीद है..ना सिर्फ पंजाब में आप भारत देश में कुछ नया करेंगे...मुझे भी आपके कनपुरिया होने पर गर्व है.
ReplyDeletebahut badhiya hai pardeep bhai.. lage raho.. apni or bhi news net par dalo.. shandar
ReplyDeletebahut bahiya kaam kiya hai pardeep bhai.. apni or bhi news dalo yaha par.. proud of u
ReplyDeletegood pradeep...u r a star reporter everyone knows this...commendable job...awesome...keep it up
ReplyDeletenice efforts!!!!!
ReplyDeletesomething similar...
DEEWAR SE GHIRAA THA, HARAM KA KASOOR KYA,
PAIDAA AGAR HADOOD ME VUS-AAT NAA HO SAKI.
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eise hi kai bato se nizaat paate paate... lagaa..
BOO-E-GULL NAALAA-E-DIL DOODE-CHIRAAGE-MAHFIL,,,
JO TERI BAZM SE NIKALAA, PARESHAA(N) NIKALAA...
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matlab ye ki....aadmiyo ki to baat chhodo..fool ki sughandh bhi,..dil ki aah bhi teri mahfil se bahaar nikalati hai to pareshaan nikalati hai....auro ki to baat hi chhodo...teri mahfil ke chirraag kaa dhuaa bhi jab bahaar nikalataa hai..to dag-matata-sa ,,,pareshaan nazar aata hai
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lage rahi india,,,,,lage raho journlist!!!
Go Ahead...Inhe trailers mano...Abhi puree film baki hai...Dunia ko dikhao apni film or batao uski hakikat...Best wishes
ReplyDeleteKumar Abhimanyu
Wah sir kamal ka jalwa dikhaya aapne. vaise is Great Step ke liye Shubhkamnaye.
ReplyDeleteI am proud of Pradeep, Keep it up.
ReplyDeleteदुनिया में हूं दुनिया का तलबगार(इच्छुक, चाहने वाला) नहीं हूं
ReplyDeleteबाज़ार से गुज़रा हूं, ख़रीददार नहीं हूं
ज़िन्दा हूं मगर ज़ीस्त (जीवन) की लज़्ज़त (स्वाद) नहीं बाक़ी
हर चंद कि हूं होश में, होशियार नहीं हूं
इस ख़ाना-ए-हस्त (अस्तित्व का घर) से गुज़र जाऊंगा बेलौस ((लांछन के बिना )
साया हूं फ़क़्त (केवल), नक़्श (चिन्ह, चित्र ) बेदीवार नहीं हूं
अफ़सुर्दा (निराश) हूं इबारत (शब्द, लेख ) से, दवा की नहीं हाजित (आवश्यकता)
गम़ का मुझे ये जो’फ़ (कमजोरी, क्षीणता) है, बीमार नहीं हूं
वो गुल (फूल) हूं ख़िज़ां (पतझड़ ) ने जिसे बरबाद किया है
उलझूं किसी दामन से मैं वो ख़ार (कांटा) नहीं हूं
यारब मुझे महफ़ूज़ (सुरक्षित) रख उस बुत के सितम से
मैं उस की इनायत (कृपा) का तलबगार (इच्छुक) नहीं हूं
muje yaad hai ye story, uss time main patiala me dianik jagran me senior repoter hua karta tha, bhaskar ki bahut achi story thi ye.
ReplyDeletemudgil abhi bhi hai kya wahan par, agar aapke paas unka mobile no. ho to muje plz mail kar dijiye pawankumar.pks@gmail.com par, wo mere sath amar ujala chandigarh me tha. main aajkal delhi me hu
Pawan dhiman
hum tumhe jeetu bulate hai. lagta hai tumne jeetu sirf suna nahi balki charitra me apna liya.aur aaj tumhare dil dimag sirf jeetun-jeetun goonjta hai
ReplyDeleteI AM PROUD OF YOU JEETU
YOURS DEEPAK