Friday, December 21, 2012
सैफई में लगा सितारों का जमघट
| सैफई महोत्सव में फिल्मी सितारों का जमघट लगा। फेमस कोरियोग्राफर श्यामक डाबर ने अपनी बेहतरीन प्रस्तुति दी। सूफी गायक कैलाश खेर के क्या कहने, वे किसी महफिल में हों और पब्लिक अपनी सीट पर न खडी हो जाए, ऐसा हो ही नहीं सकता। अपने घर में हो रहे महोत्सव को देखने मंगलवार को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव उनकी पत्नी सांसद डिम्पल यादव सपरिवार पहुंचे। |
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Thursday, December 20, 2012
Wednesday, November 21, 2012
Thursday, March 15, 2012
Wednesday, March 14, 2012
Sunday, December 18, 2011
नमस्कार
बहुत हुआ बेगानापन. पूरे डेढ़ साल बाद मुखातिब होने का मौका मिला है. आखिरी
बार पटियाला में खबर पोस्ट की थी. उसके बाद कानपुर आ गया. संसाधनों की कमी थी इस
वजह से ब्लॉग पर नियमित काम नहीं कर पाया. अब
नियमित अन्तराल पर मुलाक़ात होती रहेगी. बात वहीँ से शुरू करूँगा जहां ख़त्म हुई थी.पटियाला..... अच्छी बुरी तमाम यादों के साथ तुम्हे प्रणाम...मेरे करियर को नयी ऊँचाई देने के लिए... व्यक्तिगत जीवन में बहुत सीख देने के
लिए... इस पर बातें होती रहेंगी.
पटियाला से आने के बाद कानपुर में भी उसी अंदाज़
में काम करता रहा. फ़िलहाल इटावा में हूँ. यहाँ मेरी एक खबर पर हंगामा बरपा हुआ है.
कुछ लोगों ने मुझ पर पुलिस से मिल जाने का आरोप भी लगाया. दरअसल आगरा के एक युवक की
इटावा में उसकी प्रेमिका के घर के सामने गोली लगने से मौत हुई थी. उसकी हत्या हुई
या उसने आत्महत्या की ये अभी सवाल है. मेरे हाथ कुछ ऐसे दस्तावेज़ लगे हैं जो
उसकी प्रेम कहानी को साबित करने के लिए पर्याप्त हैं. जल्द मिलूँगा सभी दस्तावेजों
के साथ...
Monday, June 21, 2010
Wednesday, June 09, 2010
खुशहाल पंजाब में बदहाल शिक्षा
पटियाला जिले का बहादुरपुर झुंगियाँ गांव तो सिर्फ एक उदाहरण है. हकीकत तो ये है कि समूचे पंजाब में शिक्षा की ऐसी ही बदहाली है. दर्जनों ऐसे गांव हैं जहां एक भी प्राइमरी स्कूल नहीं हैं. अशिक्षा इन गांव वालों की पुस्तैनी बीमारी बन कर रह गयी है. पंजाब की समृधि में भले ही तमाम कहानियां कही जाती हों, लेकिन ये भी एक सच्चाई है कि अशिक्षित लोगों के इन गांवों की ओर विकास का कोई रास्ता नहीं जाता. यहाँ की अनपढ़ बेटियों के लिए अनपढ़ लड़कों की तलाश की जाती है, जबकि इन गांवों में अंगूठा छाप लड़कों के लिए अनपढ़ बहुएं ही ढूंढी जाती है. इन अनपढ़ मां बाप की संतानें पैदा होती हैं तो वो भी अशिक्षा के माहौल में अंगूठा छाप ही बनती हैं. न चाहते हुए भी मजदूरी करने के सिवा इन लोगों के पास रोजगार का कोई और साधन नहीं है. इन गांवों का दंश ये है कि मजदूर बाप के बेटे यहाँ मजदूर ही बनते चले आ रहे हैं. अब यहाँ के लोग अपने बेटों को मजदूर बनते नहीं देखना चाहते, लेकिन करें तो क्या करें? शिक्षा इन गांवों से कोसों दूर है. ' पढो पंजाब, बढ़ो पंजाब ' का नारा देने वाली राज्य सरकार के पास इन गांवों को शिक्षित करने की कोई योजना नहीं है. राज्य सरकार की कोई भी विकास योजना इन गांवों से होकर नहीं गुजरती. सैकड़ों सालों से अपनी बदहाली के साथ जी रहे इन गांवों में जाकर देखने पर हैरत होती है कि क्या इसी पंजाब के गुणगान होते हैं? क्या यही खुशहाल पंजाब है? क्या इन्ही कारणों से यहाँ के लोग विदेशों में मजदूरी करने को तैयार हैं. बड़ा सवाल ये है कि क्या यहाँ कि घोटालेबाज़ सरकारें कभी इन गांवों कि सुध लेंगी?
Saturday, April 03, 2010
पंजाब में अब हिंदी में भी 'सूचना का अधिकार'

'सूचना का अधिकार' कानून लागू होने के ढाई साल बाद भी पंजाब में 'आरटीआई एक्ट' महज मजाक था। 'आरटीआई एक्ट' के तहत यहाँ न तो हिंदी में आवेदन स्वीकार किये जाते थे और न ही हिंदी में जानकारी प्रदान की जाती थी. ये स्थिति तब थी, जबकि 60 फ़ीसदी लोग यहाँ हिंदी भाषी है. पंजाब सरकार के आदेश पर राज्य के सभी सरकारी दफ्तरों में इस आशय के 'सूचना पट' लगा दिए गये थे कि 'आरटीआई एक्ट' के तहत सिर्फ 'पंजाबी और अंग्रेजी' में ही आवेदन स्वीकार किये जायेंगे और इन्हीं भाषाओं में सूचना दी जाएगी. 'आरटीआई एक्ट' के तहत हिंदी में सूचना न देने से पंजाब सरकार की मंशा हिंदी को दोयम दर्जे की भाषा समझने और 'आरटीआई एक्ट' की धार कुंद करने की मालूम पड़ती थी. वर्ष 2008 की बात है. दैनिक भास्कर लुधियाना में बतौर रिपोर्टर प्रशासनिक बीट कवर करता था. डिप्टी कमिश्नर के आफिस में एक सूचना के लिए हिंदी में आवेदन किया, जिसे लेने से मना कर दिया गया. हिंदी में आवेदन स्वीकार न करने से जिला प्रशासन द्वारा आफिसियल लैग्वेज एक्ट 1963 , भारतीय संविधान की धारा 350 और आरटीआई एक्ट की धारा 6 (1) का उल्लघन हुआ. इस बात को आधार बनाकर खबर लिखी. खबर छपी तो व्यापक जनप्रतिक्रिया आई. हमारे तत्कालीन समाचार संपादक कुमार अभिमन्यु जी और स्थानीय सम्पादक राजीव सिंह जी के निर्देश पर इस खबर को पंजाब की 60 फीसदी हिंदी भाषी जनता के लिए मुद्दा बना दिया. पहली खबर छपने के बाद लुधियाना के डीएम सुमेर सिंह गुर्जर से हिदी में भी जानकारी उपलब्ध करवाने के लिए बात की तो डीएम ने साफ मना कर दिया. फिर क्या था. डीएम ने जैसा जवाब दिया, वैसा ही लिख दिया. अगले दिन डीएम का जवाब छपने के बाद खूब हंगामा हुआ. जनता ने इसे अपना मुद्दा बना लिया. इस मसले पर करीब दर्जन भर खबरें छपीं. खबर को आधार बना कर एक एनजीओ ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर दी. कोर्ट में सुनवाई के दौरान डीएम ने हाथ जोड़ कर माफ़ी मांगी, जबकि पंजाब सरकार को तुरंत हिंदी लागू करने का आदेश दिया गया.
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